बरगद के पुराने पेड़ पर हर सुबह चहचहाहट का एक मेला लगता था। चिड़ियों का झुंड पास के खेतों से दाने चुगकर लौटता, और फिर दिन भर अपने-अपने काम में लग जाता। उनमें एक चतुर गौरैया थी, छोटी, फुर्तीली, और कुछ अलग तरह की सोच रखने वाली। एक दिन गाँव के बूढ़े किसान ने अपने आँगन में मुट्ठी भर दाने बिखेर दिए। दाने साफ, चमकदार और आसानी से मिल जाने वाले थे। गौरैया ने देखा, चोंच में भरकर खा लिया। उसे लगा, “इतनी मेहनत किसलिए, जब यहाँ बिना खोजे सब मिल रहा है?”