आज भी रोज़ की तरह कावेरी अम्मा भोर में उठीं। आसमान हल्का नीला हो रहा था और दूर पहाड़ियों के पीछे से सूरज झाँकने की कोशिश कर रहा था। आश्रम एक छोटे-से गाँव के किनारे बना था जिसके चारों तरफ नीम और पीपल के पेड़, बीच में कच्चा आँगन, और किनारे पर मिट्टी-ईंटों से बना पुराना बरामदा। बरसों पुरानी दीवारों पर समय की लकीरें साफ दिखाई देती थीं। अम्मा ने चूल्हा जलाया, बच्चों के लिए नाश्ता बनाया और फिर अपना हाथ पंखा लिए बरामदे में आकर बैठ गईं पर आँखों में वही रोज़ का इंतज़ार बसा था।