बरामदे में रखी पुरानी लकड़ी की कुर्सी हर शाम की तरह आज भी दादाजी का इंतज़ार कर रही थी। सूरज ढल रहा था, और आसमान के रंग धीरे-धीरे सुनहरे से नारंगी होते जा रहे थे। तभी आँगन में भागते हुए छोटे-छोटे कदमों की आहट गूंजी। “दादाजी!” आरव ने जोर से पुकारा और उनके गले से लिपट गया। दादाजी मुस्कुराए, उनकी झुर्रियों में जैसे कई कहानियाँ छिपी थीं। “आ गए मेरे छोटे दोस्त? आज क्या सीखना है?” उन्होंने प्यार से पूछा।