सुबह की हल्की ठंडी हवा में जब बस स्टैंड के पास धूल धीरे-धीरे उठती थी और चाय की केतली से उठती भाप में अदरक की खुशबू घुलकर जैसे किसी पुराने दिन की याद बन जाती थी, तब आशा हमेशा की तरह उसी कोने में खड़ी होती, हाथ में पुराना-सा बैग, बाल सलीके से बंधे हुए, और चेहरे पर एक ऐसी शांति, जो पहली नज़र में सुकून लगती थी, पर ध्यान से देखने पर कहीं न कहीं थकान की महीन रेखाओं में टूटती हुई दिखती थी। बस आती, ...