गाँव की धूल भरी पगडंडियों, कच्चे घरों की कतारों और शाम ढलते ही लौटते मवेशियों के बीच एक नाम बहुत ही मशहूर था, रोडमल। उसका चलना भी ऐसा था मानो हर कदम ज़मीन पर नहीं, लोगों के दिलों पर पड़ रहा हो; ऊँची कद-काठी, तनी हुई घनी मूँछें, आँखों में हमेशा एक कठोर चमक, और आवाज़ में ऐसा भारीपन कि साधारण-सी बात भी हुक्म जैसी लगती थी। गाँव के छोटे-बड़े, बूढ़े-बच्चे सब उसके सामने आते ही अपने शब्दों को तौलने लगते, क्योंकि उन्हें पता था कि रोडमल को नापसंद आना मतलब अनचाही मुसीबत को बुलाना।