न धागे हैं, न जंजीरें—फिर भी बाँध लेते हैं,कभी साँसों की तरह हल्के,कभी ज़िम्मेदारियों जैसे भारी।कभी माँ की दुआ बनकरसर पर ठहर जाते हैं,तो कभी पिता की खामोशी मेंहिम्मत बनकर उतर जाते हैं।कुछ रिश्ते चा…