पुरी के समुद्र तट पर उस शाम हवा में नमक की एक हल्की सी खुशबू घुली हुई थी। आसमान धीरे-धीरे अपने रंग बदल रहा था नीले से सुनहरे, और फिर हल्के नारंगी में ढलता हुआ। दूर कहीं मछुआरों की नावें वापस लौट रही थीं, और उनके पीछे-पीछे उड़ते पक्षियों की आवाज़ें हवा में घुल रही थीं। रेत दिन भर की धूप के बाद अब ठंडी होने लगी थी, और उस पर चलते लोगों के पैरों के निशान एक-दूसरे में मिलते जा रहे थे, जैसे कई कहानियाँ एक साथ बह रही हों।