चाय की दुकान के बाहर खड़े होकर रवि ने तीसरी बार वही बात दोहराई, “यार, सच में… जाने भी दो।” सूरज अभी थोड़ी देर पहले ढला ही था और हल्की-हल्की बारिश की बूंदें स्ट्रीट लाइट में चमक रहीं थी। अमित ने कप से उठती भाप को देखते हुए बस इतना कहा, “इतना आसान होता तो शायद हम यहाँ खड़े नहीं होते।” आज दोनों की बातों के बीच एक गहरी चुप्पी ने जगह बना ली थी।